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नाथुला का अदृश्य सिपाही

4 अक्टुबर 1968
तेजी से ख़राब होता मौसम और उसके साथ होती बर्फ़बारी देख कर ऐसा लग रहा है जैसे की नाथुला -दर्रा आज मेरी परीक्षा लेने का मन बनाये बैठा है। सही मौसम में भी बर्फ में रास्ता खोजना क्या कम मुश्किल होता है जो अब इस ख़राब मौसम और ताज़ी पड़ी बर्फ ने इस काम को लगभग नामुमकिन सा बना दिया है। मैं लगातार चल तो रहा हूँ, पर पैर के नीचे क्या है ये पता नही चल रहा। तभी एकाएक मेरा संतुलन बिगड़ा और ऐसा लगा सर पर जैसे कोई बड़ी चीज़ टकराई हो। मै कुछ देर वही अचेत पड़ा रहा, आधी रात का कोई पहर रहा होगा जब मेरी चेतना मुझे वापस सी आती लगी। मैंने अपनी सारी शक्ति लगाई और चल पड़ा अपने हेडक्वार्टर की तरफ…

बढ़ती रात के साथ ठण्ड भी बढ़ती जा रही हैं। कैंप पहुचते ही मैं अपने क्वार्टर में सफर की थकान मिटाने चला गया। सुबह जब मेरी नींद खुली तो पता चला कि मेरा कुछ सामान वही नाथुला के पास ही कही गिर गया था। लेकिन अच्छी बात ये थी कि मेरी कंपनी की एक पार्टी मेरा वो सामान लाने के लिए पहले ही नाथुला की तरफ निकल चुकी थी। मैंने घड़ी की तरफ देखा तो पाया कि मेरे ड्यूटी का समय हो गया हैं।
7 अक्टुबर 1968
आज 3 दिन बीत गए, पर अभी तक मेरी कंपनी के साथियों को मेरा सामान नहीं मिला, इस होती देर को मैं समझ सकता था, क्योंकि नाथुला -दर्रे में होती बर्फ़बारी और साथ ही बहती नदी में तेज़ पानी का बहाव उनके लिए भी वही मुसीबत खड़ी कर रहा होगा जो मेरे लिए किया था। मै अपने साथियों के लिए चिंतित था, क्योंकि नाथुला -दर्रे का मौसम कभी भी बदल सकता है।
तभी अचानक मुझे याद आया कि मेरा सामान कहा छूट गया था। मैने तुरंत ये बात अपने एक साथी को बताई और कुछ ही देर में उन्हें वो सब कुछ मिल गया जिसके लिए वो गए थे।
खोजी पार्टी मेरा सामान ले कर वापस कैंप आ चुकी हैं। ये ऐसा समान था जो मैं कभी भी घर नहीं भेजना चाहता था,पर क्या करता, तैयारी पूरी हो गयी है। इसके बाद मेरा समान मेरे घर को निकल गया। और मैं यही रुक गया क्योंकि अभी मेरी ड्यूटी बाकी थी।

रात के कोई 3 बज रहे होंगे। रोज की तरह मैं राउंड लगा के अपने क़वाटर की तरफ वापस जा रहा हूँ, कि तभी कोत के पास खड़ा जवान मुझे सोता हुआ सा लगा। अब आपको लगेगा कि इस ठंड में झपकी आना कौन सी बड़ी बात है और नाथुला -दर्रे के इस सुनसान इलाके में अगर कोई गलती से सो भी गया तो क्या बिगड़ जाएगा। लेकिन अगर हम भी सो जाएंगे तो पहरेदारी करेगा कौन, वैसे मेरा अपना एक तरीका है लोगो को जगाने का। जवान के जाग जाने के बाद मैं वापस अपने क्वार्टर की तरफ चल पड़ा। वर्दी पर थोड़ी मिट्टी लग गयी थी और जूतों का भी वैसा ही हाल था। वर्दी को उतार के मैंने वही बिस्तर के पास रखी मेज़ पे रख दिया और जुते भी मेज के नीचे कर दिए।

सरसराती ठंडी हवाओं के बीच मेरी नज़र मेज के ऊपर रखे मेरे टिकट पे गयी। मेरा सामान पैक होकर मेरे सामने रखा हुआ है और समय आ गया था छुट्टी पर घर जाने का। मेरे न होने पर अगले कुछ रोज़ संतरी और सिपाहियों का काम बढ़ जाएगा, इसलिए जाने से पहले एक आख़री राउंड लगाने के लिए मै निकल पड़ा। मैंने पाया कि संतरी, सिपाही सब अपनी जगह मुस्तैद हैं। इधर से निश्चित हो कर अब मैं सुकुन से दो महीने की छुटी पे घर जा सकता हूँ। अगली सुबह मेरा सामान ट्रैन में मेरे बर्थ के नीचे रखा हुआ मिला और मैं निकल चुका गया कुछ दिन आराम के लिए……

“4 अक्टूबर 1968 को नाथुला -पास के समीप बाबा हरभजन सिंह का पैर फिसल गया और घाटी में गिरने से उनकी मौत हो गयी थी। घाटी में पानी का तेज बहाव होने के कारण भारतीय सेना को उनके पार्थिव शरीर को खोजने में काफी दिक्कत हो रही थी। तब बाबा हरभजन ने तीन दिन बाद अपने एक साथी को सपने में आकर अपने शरीर के बारे में बताया और इस तरह से बाबा हरभजन का शरीर खोजा जा सका। 1968 से ले कर आज तक बाबा हरभजन सिंह अपनी ड्यूटी रोज़ करते आ रहे है और कई जवानों ने ये बताया है कि ड्यूटी के वक़्त गलती से भी सोने पर भी ऐसा लगता है कि कोई उन्हें झापड़ मार के उठा देता हैं। जिन दो महीने बाबा हरभजन छुट्टी पे अपने घर जाते है उन दो महीने सेना को अलर्ट पे रखा जाता हैं।“