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जापानियों से लड़ता एक शहीद सिपाही

कल शाम ठंड लगातार बढ़ती जा रही थी। खुद के हाथ पैर बर्फ से ज्यादा ठंडे से ज्यादा ठंडे महसूस हो रहे थे। सामने क्षितिज पर सूरज भी जमीं को छूने के लिए निकल पड़ा और हर बीतते समय के साथ आँखें भी अब भारी होने लगी थी। अभी कुछ समय पहले तक वो जगह जो भारतीय और जापानियों की गोलियों की तड़तड़ाहट से गुज रही थी, अब वहां किसी मरघट सी ख़ामोशी छाई हुई थी। इस खामोशी में मुझे खुद की धड़कन किसी तेज़ बजते नगाड़े जैसी लग रही थी। कुछ देर बाद धड़कनों का सुनाई देना बंद हो गया और उसके साथ ही कब आँख लग गयी कुछ पता न चला।

दोनों तरफ से चलती गोलियां और आग उगलती तोपों की आवाज़ से मेरी नींद खुली। रोज के मुकाबले आज शरीर हल्का लग रहा था ऐसा लग रहा था मानो जैसे मैं फिर से अपने बचपन में लौट आया हूँ। अलग ही स्फूर्ति महसूस हो रही थी और कंधे पर लटकी राइफल भी आज अपने वजन से आधे से भी कम लग रही थी। अभी मैं खुद में आये इस बदलाव को समझ ही पाता ही एकाएक गले में ऐसा लगा जैसे किसी ने गर्म रेत डाल दी हो। इतनी तेज प्यास मुझे शायद ही पहले कभी लगी होगी। मेरा हाथ जैसे ही पानी की बोतल की तरफ गया पता चला कमबख्त जापानियों ने मेरा तो कुछ न बिगाड़ पाये लेकिन मेरी वर्दी की तरह ही बोतल को भी गोलियों से छलनी कर दिया था। पानी के लिए मैंने अपने साथी को आवाज़ लगाई ही थी, कि जापानियों ने फिर से गोलीबारी शुरू कर दी, गोलीबारी के बीच में भी मै चिल्लाता रहा क्योंकि गोलियों का पता नहीं पर ये प्यास जरूर मेरी जान ले लेती। चलती गोलियों के बीच मेरी आवाज कही ही गुम हो गयी, फिर भी मैंने चिल्ला के अपने कमांडर को बताया कि मैं पास के ही अपने बेस पर वापस जा रहा हूँ। उसके जवाब देने से पहले ही मैं वापस बेस के लिए निकल पड़ा।

आज जापानियों के लिए मैं किसी अदृश्य साये जैसे हो गया था। जापानियों के किसी भी सिपाही ने मेरी तरफ एक भी गोली न चलाई। मैं बेफिक्री के साथ जापानियों की गोलियों के बीच से टहलता हुआ अपने बेस की तरफ बढ़ा।

कैम्प में मेरा अंग्रेज़ अफसर सामने ही खड़ा था। मुझे लगा शायद ये मुझे वापस भेज देगा लेकिन मैंने भी मन बना लिया था कि बिना पानी पीये वापस नहीं जाऊँगा। मैं अपने अफसर की तरफ बढ़ रहा था, तभी पीछे से मेरी कंपनी के कुछ जवान तेज़ी से दौड़ते हुए मेरे पास से गुजरे। इस स्थिति में मैं अपनी प्यास को भूल कर किनारे खड़ा हो गया, क्योंकि मेरी प्यास से ज्यादा इन जवानों का उस अफसर से मिलना जरूरी था। जवान अँग्रेज़ी अफसर को जापानियों के साथ हुए लड़ाई में मारे गए हमारे साथियों के नाम बता रहे थे। ये सुन कर मेरी प्यास गायब हो गयी, मैं कुछ देर वहां बस चुपचाप खड़ा रहा और उस अँग्रेज़ अफसर को रजिस्टर में हमारे शाहिद साथियों के नाम लिखता देखता रहा। नाम की लिस्ट खत्म होते ही मैं अपने बैरक की तरफ चल पड़ा|

बैरक की शांति और घर के सपनों में खोये रात कब कट गई कुछ पता ना चला। ऐसी गहरी नींद शायद ही पहले कभी आई थी। भूख प्यास का मुझे कुछ अहसास ही नहीं हो रहा था। अपने आप में आए इस बदलाव से मैं अभी तक हैरान था। सारी बातों को सोचता हुआ मैं फिर भी कैंटीन की तरफ चल पड़ा कि क्या पता शायद खाना देख के ही भूख लग जाए। कैंटीन का रजिस्टर सामने खुला मिला, रजिस्टर में कई नाम कटे हुए थे। ये कटे हुए नाम मेरे शहीद हुए साथियों के थे, जिन्होंने ने जापानियों से लोहा लेते हुए देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी। रजिस्टर में मैंने अपने नाम को देखा सुबह मिलने वाले खाने की जगह खाली थी मतलब सुबह का मेरा खाना मैंने नहीं खाया था। मेरे नाम के नीचे ही मेरे दोस्त का नाम था जो कटा हुआ था ये नाम पढ़ते ही मेरी भूख खत्म हो गयी। मैं वापस अपने बैरक में आ गया और कब झपकी लग गयी पता ही नहीं चला। बिना भूख प्यास के मैं बैरक में कितने दिन बैठा रहा मुझे सही से याद नहीं कि तभी एक दिन पीछे वाली बैरक से कुछ तेज़ आवाज़ आयी। ध्यान से सुनने पर पता चला की जापानियों ने हमारी रसद की लाइन को काट दिया है। ये खबर सुन कर मैं थोड़ा परेशान हो गया जबकि खाना खाएं हुए न जाने मुझे कितने दिन हो गए थे।

सारी चीज़ों को सोचते हुए मैं कब फिर उस गहरी नींद में सो गया मुझे पता नहीं, बाहर आती तेज़ आवाज़ से मेरी नींद खुली पता चला हम लड़ाई जीत चुके थे। हमारे साथी खुश थे और मैं भी, मैंने अपने एक साथी को आवाज़ लगाई लेकिन शायद बाकी लोगों की आवाज़ में मेरी आवाज कही गुम हो गयी।

तभी मुझे कही से अपना नाम सुनाई दिया मैंने उधर देखा लेकिन मेरा नाम लेने वाला मेरा परिचित नहीं था। मैंने सोचा शायद मेरे किसी साथी ने इसको मेरे बारे में बताया होगा लेकिन फिर देखते ही देखते हर तरफ से मेरे नाम की आवाज़ आने लगी। मैं कुछ समझ पाता तब तक फिर से एक गहरी नींद का झोंका आया मैं वापस से नींद की आगोश में जाने लगा।

” बदलूराम का बदन ज़मीन के नीचे है,
और हमें उसका राशन मिलता है “

“द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जापानियों से लड़ते हुए बदलूराम शहीद हो गए थे, लेकिन बदलूराम की कंपनी का क्वार्टर मास्टर ग़लती से बदलूराम के नाम का राशन भी मंगवाता रहा और युद्ध के निर्णायक समय में जब जापानियों ने भारतीयों को जाने वाली रसद लाइन पर कब्ज़ा कर लिया तब पुरी कंपनी ने बदलूराम के हिस्से का राशन खा कर जापानियों से लड़ाई लड़ी थी।”